यवतमाळ

उर्दू साहित्य तथा क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले पुरस्कार से बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ सम्मानित

वासीक शेख

यवतमाल , दि. ११ :- रविवार तारीख ८ सितंबर २०१९ को माननीय अल्पसंख्यक राज्यमंत्री महाराष्ट्र राज्य श्री अतुल मोरेश्वर सावे साहब,औरंगाबाद के संसद श्री इम्तियाज़ जलील साहब तथा महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी के कार्ययाध्यक्ष श्री राणा अय्यूब साहब के हाथों, महाराष्ट्र की ऐतिहासिक नगरी ‘औरंगाबाद’ के वीआईपी सभागृह में एक भव्य समारोह में बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ को उनकी ग़ज़लों की काव्य रचना पुस्तक ‘शहरे-ख़यालात’ के लिए प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर साहित्य,कला से जुड़ी कई जानी मानी हस्तियां इस सभा गृह में मौजूद थीं।

हर वर्ष यह पुरस्कार उर्दू साहित्य की विभिन्न विधावों में उत्कृष्ट लेखन के लिए दिया जाता है, इस वर्ष महाराष्ट्र के अमरावती विभाग से ऐसे चार रचनाकारों का चयन किया गया जिनमें बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ को यह पृस्कार कविता के क्षेत्र में दिया गया। बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ का सम्बंध अमरावती जिल्हे के धामनगाँव (रेलवे) से हैं। वे स्थानीय नगर परिषद शाला में अध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं ,साथ ही इसी वर्ष गुरुवार तारीख ५ सितंबर २०१९ को शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें धामनगाँव (रेलवे) नगर निगम ने शिक्षा क्षेत्र में अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए ‘क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया है।

राज्य स्तर पर बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ को सम्मानित किए जाने पर धामनगाँव (रेलवे) तथा यवतमाल शहर के लोगों में उतसाह व खुशी का माहौल है।
इस अंचल से उर्दू साहित्य अकादमी जैसा सम्मानजनक पुरस्कार प्राप्त करने वाली वह पहली महिला है। इस सम्मान के कारण धामनगावँ (रेलवे) तथा यवतमाल ही नहीं बल्कि अमरावती तथा यवतमाल जिल्हे का भी नाम भी रोशन हुआ है।

ज्ञात रहे कि स्वभाव से अंतर्मुखी बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ यवतमाल निवासी स्वर्गीय सैय्यद जमालुद्दीन टेलर तथा अमरावती जिल्हे के धामनगाँव (रेलवे) में स्थानीय नगर परिषद शाला में अध्यापक के पद पर कार्यरत सैय्यद सलीमउद्दीन की पत्नी है। बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ ने अपने लेखन की शुरुआत स्थानीय अखबारों से की थी। धीरे- धीरे उनकी शायरी में निखार आता गया। बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ को मिला यह सम्मान इन अर्थों में बहुत बड़ा बन जाता है जब एक तरफ जहां मुस्लिम समाज में पुरषों की तुलना में महिलाओं को सीमित अवसर उपलब्ध हैं। इन विपरीत परिस्थियों के बावजूद उन्होंने अपनी कलम की धार को कुंद नहीं होने दिया।

बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ की इस उपलब्धि को बदलते समाज की एक दस्तक के रूप में देखा जाना चाहिए। बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ ने समाज के इसी बदलाव को अपनी शायरी के माध्यम से व्यक्त किया है। उनकी ग़ज़लों में समाज में पसरी विसंगतियों के साथ-साथ मानवीय प्रेम की विभिन्न छटाओं को जा-बजा देखा जा सकता है । उन्होंने समाज के दुख दर्द को बेहद खूबसूरती के साथ एक कलात्मक अभिव्यक्ति दी है। उनकी अधिकतर ग़ज़लें प्रेम की बानी से ओत-प्रोत हैं। नफरत, हिंसा के बढ़ते इस दौर में बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ की शायरी प्रेम की अलख जगाती है। देखिए किस खूबबसूरती से वे अपने इस शेर में प्रेम एवं मोहब्बत की मद्धम वाणी को सुनने का हम से आग्रह करती हैं।

नग्मों की बहुत दूर से आती हैं सदायें ,
झरनों का देखिये कहीं संगम तो नहीं है।।

(आपस में मिलन ,संगम प्रेम को बढ़ाता है , वहीं दूरियां कटुता और नफरत को जन्म देती है। )

बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ की ग़ज़लों का हिंदी संस्करण इसी वर्ष ‘तन्हाइयों के रंग’ शीर्षक के साथ मुम्बई से प्रकाशित हुआ है। पेश है उसी संकलन से कुछ और शेर…

खुशबू-ए -वफ़ा से ये महकता है मेरा दिल,
फूलों की मेरे जिस्म पर पोशाक नहीं है ।।

अतराफ़ मेरे घर के नहीं गुलिस्तां कोई ,
बातों में महक प्यार की शामिल तो वही है।।

आप बस मुस्कुरा दीजिये,
गुल पर शबनम गिरा दीजिये ।।

धूप सर पर बहुत है मेरे,
आप पलके झुका दीजिए।।

इस तरह बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ की सभी ग़ज़लें प्रेम की चाशनी में डूबी हुई है।अपने आस पास साहित्यिक वातावरण ना होने के बावजूद बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ ने अपनी लगन से आज यह मक़ाम हासिल किया है। उनकी यह सफलता हम सभी के लिए प्रेरक हैं। अपनी इस कामियाबी का श्रेय वह अपने श्री पिता रशीद खान जिन्होंने सदा जीवन में कठिन परिश्रम और शिक्षा को सर्वपरि माना एवं सासू माँ श्रीमती हुसैना बी जिन्होंने अपनी बहू को हमेशा अपनी बेटी जैसे माना कर उनका आत्मबल बढ़ाया तथा पति सैय्यद सलीमउद्दीन जो सदा महिलाओं की प्रगति के पक्ष रहे हैं । विवाह के बाद लगातार उन्होंने बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ को लिखने के लिए प्रेरित ही नहीं किया बल्कि हर क़दम पर अपनी पत्नी बेबीनाज़ ‘पुरवाई’ का हौसला भी बढ़ाते रहे है.

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